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सबेरा कब होगा

सिकती तन, सबेरा कुंज कहेगा, सबेरा कब होगा, पूछता चाँद-सूरज से होगा। जब कोई फँस जाएगी काली रात की अंधेरी में, सुनता सिर्फ रात होगा, काली नीयत का इंसान तो वो होगा। मैं आऊंगी रात लिए तेरी बिस्तर पे, बस कह देना, तेरी बहन होती तो क्या होता? रात काली छाया, मन मैला, तन पाप, बस आज भर रुक जा, बहन से पूछ कर कल आना। मैं राजी तन रागी, मेरी उम्मीद की परीक्षा है, तेरी बहन, बेटी होती तो क्या तू होता राजी? मेरी उम्मीद है, तेरी हृदये ना होती राजी। बात वही, भीड़ वही, आक्रोश वही, मलाल इस बात का, जंग दो दिन का होगा। फिर सब वही, जैसे चलता आ रहा है, दो दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात। मैं लुटती रहूंगी, सिसकती रहूंगी, नहीं बदलेंगे ये लोग, मैं जलती रहूंगी, मरती रहूंगी। बात होनी बंद होगी, दफ्तर जाना चालू, अखबार में चर्चा बदलना जारी होगा। दुनिया बदल रही होगी, मैं थमी हूंगी, रुक जाओ सब, अब मेरा गला घुट रहा है। लगो एक साथ शोर, बदल दो कानून का अर्चन, बनाओ कठोर कानून का फंदा। फिर वो दिन हमारा होगा, जब इन अदमखोरों के गले में फंदा होगा, और सुर्ख अंकछर में लिखा होगा: "चुनना मत, तुम्हारे गले में कानून का फंदा होगा।...